नई दिल्ली/ जम्मू-कश्मीर के किश्तवाड़ जिले के दूरदराज गांव लोई धार की शीतल देवी के जन्म से ही हाथ नहीं हैं। इसके बावजूद 16 साल की शीतल देवी ने इसे कभी अभिशाप नहीं माना बल्कि इस कमी को अपने लिए वरदान मान लिया।
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| बिना हाथ के जन्म लेने वाली शीतल की तीरंदाजी के सभी कायल, शीतल इसका श्रेय भारतीय सेना को देती हैं |
डेढ़ साल पहले ही सेना के अधिकारी ने कटरा में माता वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड तीरंदाजी अकादमी के कोच कुलदीप वेदवान को शीतल के बारे में बताया। बस यहीं से शीतल की जिंदगी बदल गई। उनके लिए विशेष धनुष तैयार कराया गया, जिसे हाथ से नहीं बल्कि पैर और छाती की मदद से चलाया जाता है।
छह महीने के अंदर ही शीतल ने इसमें महारत हासिल कर ली और विल्सन में खेली जा रही विश्व पैरा तीरंदाजी के फाइनल में पहुंचीं। शीतल दुनिया की पहली ऐसी महिला तीरंदाज हैं जिनके जन्म से हाथ नहीं हैं। वे कहती हैं...
मैं शीतल देवी जम्मू-कश्मीर से ताल्लुक रखती हूं। मेरी कहानी हर उस इंसान के लिए प्रेरणा है जो लोग किसी न किसी शारीरिक कमियों से गुजर रहे हैं और उन लोगों के लिए भी है जिन्हें ईश्वर की तरफ से सभी अंग सही-सलामत मिले हैं। तब भी वे बात-बात पर जिंदगी से शिकायतें करते हैं और यहीं नहीं कभी कभी ईश्वर को कसूरवार ठहरा देते हैं।
शीतल इसका श्रेय भारतीय सेना को देती हैं
मुझे इस मुकाम तक पहुंचाने का श्रेय भारतीय सेना को जाता है। 2019 में भारतीय सेना का एक दल किश्तवाड़ जिले के मुगल मैदान क्षेत्र में गश्त लगा रहा था I इस दौरान मुगल मैदान के सरकारी विद्यालय में उनकी नज़र मुझ पर पड़ी।
मैं उस वक्त दोनों पैरों से अपना स्कूल बैग खोल रही थी। मैंने किताब निकाली और पांव की उंगलियों से लिखने लगी। मेरी इस प्रतिभा ने उनको चौंका दिया और भण्डारकोट स्थित सेना की 11वीं राष्ट्रीय राइफल्स ने मेरे परिवार से लोई धार गांव में संपर्क किया।
गांव ऊंचाई पर है और नजदीकी सड़क से एक घंटे की कठिन चढ़ाई के बाद स्कूल पहुंचा जा सकता हैI इसी चढ़ाई वाले रास्ते से मैं रोजाना नीचे उतरकर मुगल मैदान मैं अपने स्कूल जाया करती थी और इसी रास्ते से मैं घर वापस लौटती।
मेरे माता पिता बहुत गरीब हैं। पिता किसान और मां बकरियों को संभालती हैं। लेकिन उन्होंने मेरी शारीरिक स्थिति देखकर कभी हार नहीं मानी और न ही मुझे किसी शारीरिक कमी का अहसास होने दिया और फिर सेना ने मेरी पढ़ाई का सारा जिम्मा उठा लिया। जिससे मुझसे और मेरे परिवार को काफी सहारा मिला।
मेरी जिंदगी में कर्नल शीशपाल सिंह मसीहा बनकर आए
11 राष्ट्रीय राइफल्स भारतीय सेना ने कर्नल शीशपाल सिंह की कमान ने मई 2020 में मुझे गोद में लेकर सद्भावना दिखाई और अलग-अलग एक्टिविटीज में हिस्सा लेने में मेरी मदद की। धीरे-धीरे मुझे कामयाबी हासिल होने लगी। युवाओं के लिए और दिव्यांग बच्चों के माता पिता के लिए मैं प्रेरणा बनी।
मई 2021 में कर्नल शीशपाल ने सोशल वर्कर मेघना गिरीश से मुलाकात कराई और उनसे मेरे लिए आर्टिफिशियल हाथ बनवाने में मदद मांगीI
मेघना बहादुर अफसर मेजर अक्षय गिरीश की वीर माता हैं और बेंगलुरु में रहकर अपने पति विंग कमांडर गिरीश कुमार के साथ मिलकर मेजर अक्षय गिरीश मेमोरियल ट्रस्ट नाम का स्वयंसेवी संगठन चलाती हैं और देश भर में वीर परिवारों की सेवा कर रही हैं।
अनुपम खेर ने की मदद
मेघना ने मेरी कहानी सुनते ही फौरन 11 नेशनल राइफल्स को आश्वासन दिया और मदद के लिए कोशिश करने लगीं I इसके बाद मेघना ने ही अभिनेता अनुपम खेर से संपर्क किया और मेरे बारे में उन्हें बताया। अनुपम खेर मेरी कहानी से काफी प्रभावित हुए और मुझे कृत्रिम हाथ दिलाने का वादा किया। इसके बाद फोन पर ही सी ओ 11 राष्ट्रीय राइफल्स, मेघना गिरीश जी और अनुपम खेर के बीच विचार विमर्श हुआ और मेरे इलाज की तैयारी शुरू हो गई।
दिव्यांग खिलाड़ियों से मुलाकात
सब कुछ तय होने के बाद मैं अपने माता पिता और एक सैनिक के साथ बेंगलुरु गईI बेंगलुरु में मेघना गिरीश और स्वयंसेवी संगठन ‘द बीइंग यू‘ की प्रीती राय ने सारा इंतजाम किया और अस्पताल में मेरे टेस्ट कराए और वापस किश्तवााड़ भेजा दियाI
फिर दो महीने बाद मैं अपने माता पिता के साथ बेंगलुरू गई और वहां डॉक्टर श्रीकांत ने मेरे कृत्रिम हाथ लगाएI इस दौरान प्रीती राय ने देखा कि मेरी ताकत मेरे पैरों में है। उन्होंने मुझे कई नेशनल और इंटरनेशनल दिव्यांग खिलाड़ियों से मिलवाया। इस दौरान स्पोर्ट्स में मेरे टैलेंट को परखने के लिए कई टेस्ट भी कराए गए। टेस्ट में पाया गया कि मैं पैरा गेम्स में हिस्सा ले सकती हूंI मुझे तीरंदाजी के लिए चुना गया।
तीरंदाज़ मैट के वीडियो दिखाए
तीरंदाजी सीखना आसान नहीं था। तीर कैसे चलाना यह मुझे नहीं पता था। इसके लिए मुझे दुनिया के पहले बिना हाथों के तीरंदाज अमेरिका के मैट स्टुट्जमैन के वीडियो दिखाए गए। इससे काफी मदद मिली।
मैट भी यहां खेलने आए और मुझसे मिले। उन्होंने मेरा धनुष देखा और इसमें कुछ बदलाव करने सलाह भी दी। पैरालिंपिक में पदक जीत चुके मैट ने यहां 685 का स्कोर किया, जबकि मैंने 689 का स्कोर खड़ा किया।
मुझे टीम इवेंट का मुकाबला भी खेलना था, लेकिन उस वक्त मेरी तबीयत काफी खराब हो गई। जिसकी वजह से मुझे अस्पताल में भर्ती होना पड़ा।
इसके बाद मेरे कोच श्री कुलदीप बैदवान और अभिलाषा चौधरी ने कड़ी मेहनत करते हुए मुझे प्रैक्टिस कराना शुरू कियाI मेरे दोनों कोच के मार्गदर्शन में श्री माता वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड कटरा में तीरंदाजी की ट्रेनिंग शुरु हुई। हाल ही में हुए एशियाई पैरा गेम्स में मुझे कामयाबी और पहचान मिली। 2 गोल्ड और 1 सिल्वर पदक जीतकर देश के नाम रोशन किया।
प्रधानमंत्री ने हौसला भी बढ़ाया, 2024 की पेरिस ओलिंपिक की तैयारी जारी
प्रधानमंत्री ने भी मुझे सम्मानित किया और मेरा हौसला बढ़ाया। यही नहीं किश्तवाड़ के सभी आला अफसरों, नेताओं ने मेरा तहे दिल से स्वागत किया। आज किश्तवाड़ का नाम पूरी दुनिया में स्वर्ण अक्षरों से लिखा जा रहा है। कई दिनों तक मेरे गांव लोई धार में जश्न का माहौल रहा। इसके बाद में मेरे घर आकर बधाई देने वालों का तांता लगा रहा। अब मैं 2024 में पेरिस, फ्रांस में होने वाले ओलिंपिक की तैयारी कर रही हूं। जहां से मैं अपने देश के लिए स्वर्ण पदक हासिल करना चाहती हूं I

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